ख़रीदारी
रेल्वेस्टेशनके प्लॅटफॉर्म
नंबर छे के उपर के पब्लिक पूलकें आखिरी कोनेमें पार्वती और उसका पती किशन हाथभरसी जगह में सामान बेचने के लिए बैठे थे।
सामान
में ज्यादा कुछ नही… वही मोबाईल के प्लॅस्टिक कव्हर, ताला और चावी, बच्चों का मन बहलानेवाले
खिलौने, रंगीबेरगी लाईटवाले लॅम्प, फोन नंबर लिखने के लिए ईस्तमाल होनेवाली डायरी,
गॅस लायटर…. पर आज ज्यादा कुछ बेच नही पाऐं थे…. उसी कारण दोनो कुछ खफा-खफासे दिख रहे
थे।
”सुबहसे एकभीं खिलौना बेच नही पाऐं….मैने आपसे कहा था खिलौने आजकल कोई नही खरीदतां….आजकल के सब बच्चे मोबाईल के उपर गेम खिलने में लगे रहते हे…” पार्वती नाराज होकर कहने लगी।
“अरे अभी तो रात के साडेसात ही बजे होगे…अभी देख… सात चालीस की फास्ट लोकल आऐगी ना तो ज्यादा भीड होगी, कोई ना कोई तो जरुर कुछ ना कुछ खरीद लेगां….”
इतने में फास्ट लोकल प्लॅटफॉर्म नंबर छे पर आने की अनाऊस्टमेंट हो गई….”आप तो सुबहसे यही कह रहे है…. ताला-चाली कोई खिरीदता ही नही….”
”सुबहसे एकभीं खिलौना बेच नही पाऐं….मैने आपसे कहा था खिलौने आजकल कोई नही खरीदतां….आजकल के सब बच्चे मोबाईल के उपर गेम खिलने में लगे रहते हे…” पार्वती नाराज होकर कहने लगी।
“अरे अभी तो रात के साडेसात ही बजे होगे…अभी देख… सात चालीस की फास्ट लोकल आऐगी ना तो ज्यादा भीड होगी, कोई ना कोई तो जरुर कुछ ना कुछ खरीद लेगां….”
इतने में फास्ट लोकल प्लॅटफॉर्म नंबर छे पर आने की अनाऊस्टमेंट हो गई….”आप तो सुबहसे यही कह रहे है…. ताला-चाली कोई खिरीदता ही नही….”
पार्वती सामने रखे सामान को हाथसें एकबार गिनने में जूट गई
“अब गिनो मत” किशनने अपने तरफ आऐं पार्वती के हाथको, अपने हाथोसें रोकते हुऐ कहा “ट्रेन
आ गई” नीचे की तरफ जैसे ही ट्रेन आ गई वैसेही लोगोंकी उपर की और सीडीयों की तरफ भागने
की आवाजे दोनो को सुनाई दे रही थी……लोगो की चहलपहल को वो महसूस कर रहे थे।
किसनने एक बार हलकांसा अपना गला साफ किया….और जोरसे चिल्लाने लगा ”मोबाईल कव्हर ले लो मोबाईल कव्हर…! !घर की सुरक्षा ताला चाबी…छोटे बच्चे के लिए खिलौना ले लो ! !”
किसनने एक बार हलकांसा अपना गला साफ किया….और जोरसे चिल्लाने लगा ”मोबाईल कव्हर ले लो मोबाईल कव्हर…! !घर की सुरक्षा ताला चाबी…छोटे बच्चे के लिए खिलौना ले लो ! !”
किसन की उम्मीद
थी…दो-तीन बार चिल्लाने पर कोई ना कोई तो जरुर खरीदने के लिए रुकेंगा…. पर नही….किसीने
भीं नही पूछां….भीड की आवाज कम हो गई और उसी कारन किसन काफी निराश हो गया….”लगता है
बारिश का मौसम खत्म होने आ गया है ना….. ईसलिऐ कोई मोबाईल कव्हर ले नही रहा है” किसन
पार्वतीसे अपनी निराशा को हंसी में बदलने की कोशिश करते हुऐ कह रहा था।
पर पार्वतीने
बात को पकड लिया “कौनसी कौनसी चीजों के लिए कौनसे कौनसे नये बहाने बनावोंऐगें आप….वो
दस रुपये वाली बॅटरी बेचने के लिए रखनी चाहिए थी, सरला कह रही थी आजकल बहोत चलती है…वो
लाईट अच्छी देती है और सस्ती होने के कारण बहोत लोग लेते है….”
किसनने बेचने के लिए रखें सामान के उपरसे हाथ घुमाकर गिनते वक्त कहा “उसे कैसे पता दस रुपयेवाली बॅटरी अच्छी लाईट देते है या नही, आखिर वो भीं तो अपने जैसे है ना, पर सरला तो लॉटरी की टिकीट भेजती थी ना….” पार्वती थोडीसी गुस्सा होकर कहने लगी “सरला नही उसका पती किशोर लॉटरी की तिकीट बेचता है ओ… हो ….आप को कुछ भी याद नही रहता आज कल” किसनने मुस्कराकर कहा “क्या करे अब बूढे होने लगे है हम”।
किसनने बेचने के लिए रखें सामान के उपरसे हाथ घुमाकर गिनते वक्त कहा “उसे कैसे पता दस रुपयेवाली बॅटरी अच्छी लाईट देते है या नही, आखिर वो भीं तो अपने जैसे है ना, पर सरला तो लॉटरी की टिकीट भेजती थी ना….” पार्वती थोडीसी गुस्सा होकर कहने लगी “सरला नही उसका पती किशोर लॉटरी की तिकीट बेचता है ओ… हो ….आप को कुछ भी याद नही रहता आज कल” किसनने मुस्कराकर कहा “क्या करे अब बूढे होने लगे है हम”।
“बुढे और आप….काला चष्मा डालके रस्ते पर ज्यादा घुमना मत…
लोग फिल्मवाला हिरो समज लेंगे” पार्वतीके बात खत्म हुई नही थी की दोनों पती-पत्नी जोरजोरसे
मुस्कराने लगे।
इतने में फिरसे प्लॅटफॉर्मपरसे और एक ट्रेन निकल गई…..ट्रेन की आवाज
के साथ ही दोनो की हंसी भी कही गायब हो गई…. पार्वती आवाज सुनते हुऐं बोली ”लगता है
फास्ट ट्रेन है” हा..ट्रेन आ गई…भीड की आवाज के साथ ईस बार पार्वती जोरजोरसे चिल्लाने
लगी ”अरे लायटर ले लो लायटर….प्लॅस्टिक का फोल्डर ले लो..फोल्डर…” पार्वती की उम्मीद
पर फिरसे एक बार पानी फिर गया था।
चिल्लाते रहने के कारण उसका गला पूरी तरह सुक गया
था। ”आज सिर्फं चालीस रुपयें का सामान बेचा गया है…..उपरसे यहां बैठने का हप्ता तीनसौ
रुपयां महिने का अलग… मुझे नही लगता हम दोनो ये सामान बेच पाऐंगें…इसमें हमारा महिने
का गुजारा होना मुश्कील लग रहा है” “अरे शुरुशुरु में ऐसे होता है….” किसन बीवी को
समझाने की कोशीश कर रहा था। पर पार्वती तुरंन्त बोल पडी “आज पूरे दस दिन हो चुके है
अब तो पता चल चुका है ना, चलो फिरसे ट्रेन के अंदर…. गा….” “ट्रेन के अंदर गाना नही
गाना है अब हमें…कितने दिन तक हम वही करते रहेगें” किसन पार्वती की बात को बीचमें ही
रोकते हुऐ बोला। “पर यहांसे तो अच्छा ही कमा रहे थे हम” पार्वतीभीं कहा रुकनेवाली थी।
“कमा रहे थे! भिखं मागते थे हम…”किसन का आवाज बड चुका था उसके चेहरे पें गुस्सा साफ
दिखाई दे रहा था। अब पार्वती के आखोंसे आसूं आ रहे थे “कमसे कम उस भिख में पेट तो भर
पाते थे, यहां इज्जतसे कमाने से सिर्फं मरने के लिए आसानी हो जाऐगी और कुछ नही” अब
किसन को पार्वतीके आवाजसे पता चला की वो रो रही है उसने उसका हाथ धुंडते हुऐ कहा।
“थोडासा धीरज रखो…भगवान के घर देर है अंधेर नही” आसूकों पोछते हुऐ पार्वती बोली “अंधेर
तो है पर भगवान नही”। इतने में बारिश की बूंदे एकदमसी बरसने लगी, सही में काफी जोर
की हवा आने लगी थी, अब उपरकी छतकी बारिश की वजहसे होने वाली आवाजोंसे ठीकसे ट्रेन की
अंनाऊसमेंट सुनाई नही दे रही थी..
शायद ट्रेन आ चुकी थी….अब भीड आ रही थी..पर कोई भाग
नही रहा था….आज मौसम अचानकसे बदल गया था….कई लोगो के पास छाता नही था….वो प्लॅटफॉर्म
की उपरी पूल पर ही रुकते थे…और कोई चारा ही नही था….अब हर दुसरी नजर उस सामान पर पड
रह थी…एक बच्चा अब अपने माँसे जिदद कर रहा था…
“हां हां वही चायनीज
खिलौने…ये कितने का है घोडा है” औरत की आवाज पार्वती के कानो पर पडी।
आवाज को सुनते ही पार्वतीने
कहा “तीस का एक….है घोडा”
”पच्चास का दो दे दो!”
खिलौने की किमंत को लेकर बहस चल रही थी।
किसन बीचमें बोल “नही….परवडता
है….फिक्स रेट है”।
पर वो खिलौना खरीदने
वाली औरत बच्चे को चूप करते हुऐं किसनसे खिलौनेकी किमंत को लेकर तोलमोल की बात चल रही
थी “अरे दे दो…बारिश की वजहसे रुके, नही तो….”
पार्वती बीचमें बोल
पडी “ठीक है ले लो पच्चास का दो…अरे बच्चा बहोत ही रो रहा है लगता है”।
किसनके हाथमें उस औरतने
पच्चास का नोट रख दिया।
औरतने बच्चे के हाथमें खिलौना थमातें हुऐ मोबाईल पें आऐ कॉल
को उठाते हुऐं कहने लगी “अरे आ रही हूं बाबा,
स्टेशनपें हू बारिश… आ गई…. अचानक, और ये चिटूं खिलौने की जिदद पकड रहा था…खरीदनेवाली
नही थी……जिदद करने लगा…और वो बेचनेवाले भीं अंधे थे इसलिए….दया आ गई….वरना”
मोबाईल पर चल रही बातें
सुन रहे किसन को अपने अंदर चल रही घुटन को दबा रहा था…..और पार्वती रोना बंद कर खिलखिलानेवाले बच्चे की हंसी सुनने में दंग हो गई थी।
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