Tuesday, 5 April 2016

आझादी (Hindi Short Story)

                                  आझादी (Without Dialogue)

   ज्योत्सना खाना बनाकर सो गयी थी की  दरवाजें की बेल ने उसे जगा दिया। कुरियर पार्सल लेकर दरवाजा बंद किया। अपने आप को आईने में देख ते हुऐ, पेट की तरफ जाती नजरे उसकी आँसूवो को रोक न पाई। बिना रिश्तेदारों की अनाथ लडकी से शादी करने का पुष्कर का इरादा शायद उसे शादी की तीन साल के बाद समज आ गया था। सातजन्मों की कसम खानेवाले अपने पती की  धोखा धड़ी ने उस आठ महिने की गर्भवती को औरही खोखकला बना दिया था। हर पल सहारे की जरुरत को जानते हुऐ भी पुष्कर आज भी कामसे देरीसे आया। एक हाथ मे फलों से भरा हुआ थेला और दुसरे हाथ में पिजंरे में तोते को लेकर आया था। पुष्कर के दोस्त धमैश के अचानक गाव जानेसे तोते को घर पे लाने की ये दुसरी बारी थी। सात दिनो से चलते आ रहे झगडे का पुष्कर के रोज के दिनचर्या पर कोई असर नही पडा था।

      ज्योत्सना की देर रात जागने की वजह से पेट में पल रहे बच्चे पें होनेवाली असर की बातसे पुष्कर को और गुस्सा आ रहा था। ज्योत्सना के कंधे को जोर से पकडकर ब्लडप्रेशर चेक करने लगा। ज्योत्सना ने अपना हाथ को पटकते हुए उसे दूर होना चाहा। दोनो के ताना-सुनी का ये अब रोज का मजंर ज्योत्सना के  हद्द से बाहर था। पुष्कर को स्केचपेन से कॅलेडर पे  सर्कल करते देख होम लोन का और एक किस्त भर देने की बात ज्योत्सना समज गई। पुष्करने तोते के लिए काटें हुऐ अमरुद के तुकडो से भरी प्लेट ज्योत्सना की तरफ बढाई ही थी की उसने प्लेट को जमिन पे फेंक दिया।

पहिली बार सिर्फं पुष्कर के कहने पे, ज्योत्सना सरोगेट मदर बने के लिए राजी हो गई थी। सरोगसी से मिलनेवाले पैसे में पुष्कर को होम लोन के किस्ते नजर आते थे। पर पुरे नौ महिनो सें बच्चो को पेट में महसूस करने, सारे दर्द सहने के बाद आनेवाली खामोशी उसे खुदकुशी सी लगती थी। पुष्कर की वंध्यत्व की  बात उसे दस महिने पहलें अलमारी में छिपे कुछ रिपोर्ट से समज में आ गई थी और पुष्कर ने इस बात के लिए माफी भी मांग लिए थी। पुष्करने बच्चे को दत्तक लेने एवं अन्य पैतरो के नामजुंर करते हुऐ फिरसे सरोगेट मदर बन कर होनेवाला बच्चा खुदद लेने की बात कह कर ज्योत्सना को राजी किया था। पर अब दस दिन पहेले ही ज्योत्सना को ये खबर लग गई की होम लोन के किस्तों से पुरी तरह से छुटकारा पाने के लिऐ उसे दुसरी बार सरोगेट मदर बनाया गया था।

       पुष्कर सोफे पे लॅपटॉप लेकर बैठा ही था की दस मिनीट बाद ज्योत्सना खाना रखकर बाहरी कमरे मे रखे तोते के पिजंरे को खोल देती है। आठवा महिना होकर भी, कुछ दिनो से चलते झगडे के बावजूद ज्योत्सना ने आज फिरसे खाना कैसे बनाया इस बात से पुष्कर काफीं अचंबित था। खाना खाते-खाते ही एकदम से पुष्कर को न जाने क्या हुआ और कुछ समजनेसे पहेले ही वो मौत के आधीन हो गया। ज्योत्सना ने कुरीयर पार्सलसे आऐ सायनाईट(cyanide) के असर से अंचबित थी।

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                     आझादी (With Dialogue)


ज्योत्सना:(दरवाजे पें)
शुकिया इतनी रात को कुरीअर पार्सल लाने के लिए।

ज्योत्सना:(दरवाजा बंद कर आइने की तरफ देखते हुऐ)
आईने में चहरे वही दिखते है पर रोजमरा की कश्मकश् उस के माइने बदल देती है। काश में पहले ही समज जाती।

पुष्कर:(घर में पिजंरे मे तोते और फल लेकें दाखिल होकर फोन पर दोस्तसे)
दोस्त के लिए इतना भी नही कर सकता क्या? हा मेंने अमरुद और मिरचीया भी लेली है। अब तोते की जरुरते भीं तुझसे ही पुछगा क्या? हा हा हा…

पुष्कर:(फोन रखकर)
तूम अभी तक सोयी नही….. इसका बच्चे पें सिधा बुरा असर होता है पिछली बार कम वजन की बातसे मुझे ताने सुने पडे थे।

ज्योत्सना:
शायद मुझे पहेले ही जागं जाना चाहिए था। अगर पहिली बार सरोगेट मदर बनसे इन्कार कर देती तो आज ये सहना ना पडता।

पुष्कर:
बेबी…. बात को समझो ये हम दोनो का घरसंसार है ना…… तो थोडा तुम सहलो….. थोडा मैं सहेलाता हू … मै आजभी डबल डयूटी करके आए हू.. ये घर देखो …2BHK FLAT… . मुबंई मे खुद का घर होना हर किसी के नसीब मे नही होता और पहिली बार सरोगेट मदर बने के बाद आया पैसा मेंने अकलेने थोडी खाया छह के छह के लाख होम लोन के किस्तों मे चले गए…. मैंने भी बच्चे के लिए सिगेरेट तक बन्द कर दिई है।

ज्योत्सना:
घर की दिवारे सिर्फं अच्छे रंगो से सजाने के लिए नही होती ब्लकी वहा परिवार की सुखी तस्वीरे सजाई जाती है। तुमें तो हर वक्त पैसा नजर आता है। कुछ प्रेम, आस्था नाम की चीज रही ही नही तुम में…..!!!

पुष्कर:
अब मुझे बाबा लोग का प्रवचन मत सुना………. देखो बात को फिरसे उगालो मत!.... तुम सरोगेट मदर बन रही हो ये फैसला हो चुका है……… और जो कुछ दिन से शांती है वैसा ही माहौल रहे तो अच्छा है। रोना बंद करो तुम………. बच्चे की सेहत पे असर पडेगा।

ज्योत्सना:
तुमने कानून को धाबे पे बिठाकर मुझे दोनो बार सरोगेट मदर बना या है….. में चाहे तो आज ही पुलिस को जाकर सबकुछ बता दूंगी।

पुष्कर:
मेरे गिरफतार होने के बाद खाएगी क्या और जितना बडा व्हाईट कॉलर समाज उतना वेल-मॅनेज करपशन। ज्योत्सना डॉक्टर से लेके पुलिस तक सबको पैसा बाटा जाता है ……..और तुम्हे तो नजदीकीं रेल्वे स्टेशन भी नही पता पोलीस स्टेशन तो बहोत दूर की बात है………. सब चीज का बाजार लग चुका है यहा तुमें बस खरीद और बेचने की जरुरत होनी चाहिए।

ज्योत्सना:
बिना रिश्तोदारो की अनाथ लडकी से शादी करने का इरादा मुझे आज पता चला…… कमसे कम समाज के सामने लिए हुऐ सात फिरो का तो ख्याल रखते…..क्या क्या सपने नही देखे थे इस बच्चे को लेकर मेंने। दस दिन पहिले मुझे पता चला की तुमने सिर्फं पैसा कमाने के लिए मुझे दुसरी बार सरोगेट मदर बनाया है।….उडाने भरके आंसमा को छूनेही चली थी की तुमने आसमान गिरा कर मेरी जमिन ही छिनली।

पुष्कर:
तुम बात को नही समज रही हो ज्योत्सना…… इस बार का क्लाईट बहुत रहीस है और ये पिछली बार से तीन गुना ज्यादा पैसे देने वाला है एक बार ये होम लोन की कटकट खत्म हो जाए तो बाकी चीजें आसान हो जाऐगी। वेसी भी एक ई.एम.आय भर दिई आज …मेरी सॅलेरी आंधी तो इसी में चली गई। तुम्हारी इस सरोगसी के बाद बहुत बडा बोझ उतर जाएगा और इसी समाज में मेरा फॅल्ट! मेरा फॅल्ट! कहके चिल्लाओगी।

पुष्कर(ब्लडप्रेशर चेक करने के लिए हाथ पकडते ही):
ब्लड प्रेशर तो चेक करने दो कही कुछ-कम ज्यादा हो गया तो मेरे सारे सपने उज्ड जायेगे
ज्योत्सना:
छोडो मेरा हाथ…. सिर्फं तुम ही नही पुरे समाज पें से विश्वास उड चुका है …. शरीर हे मेरा…. मशीन नही…. क्या पुरा समाज ही अब शरीर से जुडना चाहता है उसकी साथ आने वाली कुदरत से नही। दस महिने पहिले अलमारी में छिपाऐ रिपोर्ट से मुझे पता चला था की तुम शरीर से नपुसंक हो पर आज मुझे समजमें आ गया की तुम दिलसे भी नपुसंक हो….कायर हो तुम कायर…क्या कहा था उस वक्त तुमने…. कहा था ना हम ना कोई बच्चा दत्तक लेगें ना कोई और पैतरा …..फिरसे सरोगेट मदर बन जाना बच्चा इस बार हमारा होगा…..

पुष्कर(तोते को फल खिलाते हुऐ):
तो मेरे पास और कोई और रास्ता नही ही बचा था….और नपुसंकवाली बात में बहुत बार माफी मागं चुका हूं। तोते का अच्छा है उसे तो बस खाने से मतलब है मालिक कोन है इसे कोई फरक नही पडता। तुम भी ले लो अमरुद सेहत के लिए अच्छा होता है….बल्ड प्रेशर काबू में रहेगा… तुम्हारे लिए नही बच्चे के लिए तो ले लो….माँ हो ना उसकी… तुम ये मत समजना जो खुद बाप नही बन सकेगा वो परवरिश को नही समजता


ज्योत्सना:
तुम क्या जानो परवरिश, माँ होने का सुख……… पेंट में होकर भी बच्चे को महसूस करने भरसे ही अन्दूरनी लगाव सा हो जाता है और अगले ही पल उसे बाहरी दुनिया पैसे की व्हवहार से छिन लेती है। इस गम को भुलाते भुलाते में थक चुकी हू पुष्कर।

पुष्कर(फोन पर बॉस से):
हा सर मै मेल चेक करता हूं काम है तो करना ही पडेगा ना सर…. नो प्रोब्लम….सर…

पुष्कर:
देखो ज्योत्सना मुझे ऑल-रेडी बहुत सारा काम है सो प्लीज डोन्ट डिर्स्ट्ब मी… अब फिरसे महाभारत मत शुरु करो……… आसूवांको पूछ लो…….. और पानी लाना प्लीज…

ज्योत्सना:
पानी सर से उपर बह चुका है। मेरी बातों को…महाभारत कहते हो.. हरबार में देवकी का गम लेकर …यशोदा का आंगन नही सजा सकती… मै अब और बरदाश नही कर सकती।

पुष्कर(ज्योत्सना खाना रख कर चली गई):
आठवा महिना होकर भी खाना कैसे बना लिए आज…. और उपरसे सात दिन की अनबन और खटटास के बाद… पागल ही होती है बिबीयां….

पुष्कर(खाना खाते-खाते):
ज्योज्योत्सात्साननननानानाना….

ज्योत्सना(मरे हुऐं पुष्कर को देखते):
तुम सही कहते थे बाजार हर चीज का लग चुका है बस खरीद और बेचने की जरुरत होनी चाहिए… कुरीअर से आया सायनाईट(cyanide) इतना असर करेगा सोचा ना था।

ज्योत्सना(तोते का पिजंरा खोलते हुऐ):
बगावत की शाम के इंतजार मै रह जाऐगे तो आजादी को तोड ना पाऐगे….. अब तुमे मालिक के हात के अमरुद खाने की जरुरत ना पडेगी। जहर चखता कोई और… सुकून किसी और को… जरुर जहर मीठा होगा।


-आशिष गुरव .
********************** कथा आवडल्यास अभिप्राय (कॉमेंट मारा) नक्की कळवा ***************
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